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राह मिली नहीं चलते चलते, पथिक (मैं) रुका नही थकते थकते, कुलदीप कुमार चौरसिया - राह कविता

 राह 


राह मिली नहीं चलते चलते, 

पथिक (मैं) रुका नही थकते थकते, 

चलता जा इन काँटों की राह पर, 

परेशानियां मिली बहुत रास्ते में चलते चलते।

सफलता मिलेगी नही यूँ कहने से, 

अगर हम काम न करें गहने (मन) से। 

मंजि

Kuldeep kumar chaurasiya

ल एक दिन चूमेगी कदम हमारे, 

अगर हम न रुके थकते थकते।



              कुलदीप चौरसिया की कलम से✍️


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